लघुकथा – धवलपुर की धूल

धवलपुर की धूल

 

पहले धवलपुर किसी भी दूसरे छोटे शहर जैसा था। यहाँ की सड़कों से गुज़रते हुए वही नज़ारे सामने आते थे जो किसी भी छोटे भारतीय शहर में नज़र आते हैं। सँकरी गलियों से जूझती गाड़ियाँ, आपस में सँटे हुए एक या दो मंज़िला मकान, मोबाइल फ़ोन सेवाओं के विज्ञापन, फ़िल्मों और नेताओं के पोस्टर, दो-चार सार्वजनिक पार्क वगैरा। ये सब नज़ारे अब भी वैसे ही हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में एक बदलाव आया है। जिसने तब का धवलपुर देखा हो वो आज अगर यहाँ आए तो पहचानेगा ही नहीं कि ये वही शहर है। धवलपुरवासियों को अपना शहर अगर ख़ास लगता है तो ये स्वाभाविक है लेकिन अब बाहर वालों की नज़रों में भी इस शहर की ख़ास जगह बन गई है। अब ये ख़ास बात क्या है ये तो वो बाबाजी ही जानें जिनके यहाँ आने पर ये बदलाव शुरू हुए थे। उन्होंने कुछ तो देखा होगा इस शहर में जो उन्होंने कई साल इधर-उधर घूमने क बाद इस शहर को अपना घर बनाया।

 

बाबाजी के धवलपुर आने के कुछ ही दिनों में उनके रहने और खाने का इन्तज़ाम हो गया था। ये उनके व्यक्तित्व का प्रभाव था या भगवे रंग के कपड़ों का, इसका निर्णय तो आप ख़ुद ही करें, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि उनके यहाँ होने से जैसे धवलपुर की कोई कमी पूरी होती हो।   

 

बाबाजी अपने बारे में कभी कोई बात नहीं करते हैं, फिर भी जो थोड़ी बहुत जानकारी इधर-उधर से सुनकर इकट्ठी हो पाई है वो ये है कि वो पहले सरकारी नौकरी में थे और इसी प्रान्त के किसी शहर में रहते थे। पत्नी के स्वर्गवास और बच्चों के अपने पैरों पर खड़े हो जाने पर उनमें वैराग्य जागा और सेवा-निवृत्ति के तीन साल पहले ही नौकरी छोड़कर हिमालय चले गए। बारह साल वहाँ रहने के बाद उन्होंने देशाटन शुरू कर दिया। एक शहर से दूसरे शहर जाते पर कहीं भी दो-तीन महीनों से ज़्यादा नहीं रुकते। अन्त में जब धवलपुर आए तो न जाने उन्होंने यहाँ क्या देखा कि पिछले दो साल से इसी शहर में रह गए हैं।

 

लेकिन यहाँ हम बात बाबाजी की नहीं कर रहे हैं, बल्कि धवलपुर और उसमें आए बदलाव की कर रहे हैं। इस बदलाव के सिलसिले की शुरुआत उस दिन हुई जब बाबाजी हमेशा की तरह शाम के भजन के बाद लोगों से बैठे बातें कर रहे थे। लगभग तीस लोगों का समूह था। किसी ने, शायद अपने निजी जीवन की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए बाबाजी से पूछा कि घर में सुख-शान्ति बनाए रखने का क्या उपाय है। बाबाजी गम्भीर हो गए और कोई जवाब नहीं दिया, उल्टा सब को घर चले जाने को कह दिया। लोगों ने पूछा कि क्या हुआ पर उन्होंने कुछ नहीं कहा, और उस शाम बैठक जल्दी ख़त्म हो गई। अगले दिन भजन के बाद बाबाजी ने उस सवाल के जवाब में एक कहानी सुनानी शुरू की –

 

“धवलपुर की प्राचीनता तो आप लोग जानते ही हैं। राजा धवलप्रताप ने दसवीं शताब्दी में अपनी राजधानी शूलपुर से बदलकर धवलपुर को बसाया था। धवलप्रताप के वंश में तीसरी पुश्त में राजा रुद्रप्रताप हुए थे, जिनके राज में धवलपुर की समृद्धि और भी बढ़ गई थी, और ये इस प्रान्त का मुख्य व्यापारिक केन्द्र बन गया था। शहर के धनिकों में एक नाम नवयुवक सेठ देवदत्त का था। व्यापार के काम से उसको दूर दूर के शहरों में जाना होता था। हर साल बरसात के बाद वो अपने कर्मचारियों के साथ मिल कर काफ़िला तैयार करता, बैलगाड़ियों पर माल लादता और शहर से निकल पड़ता। अलग-अलग शहर जा कर माल ख़रीदता-बेचता और जब सर्दी के मौसम में वसन्त में झलक दिखने लगे उन दिनों अपने शहर वापस लौटता। बाकी के सात-आठ महीने वो धावलपुर में रहकर यहाँ का काम सँभलता। उसकी अनुपस्थिति में उसकी पत्नी वसुमती उसकी राह देखती और वसन्त ऋतु के जल्दी आने के कामना करती। एक बार शरद् ऋतु में जब देवदत्त अपने दौरे पर जाने की तैयारी कर रहा था, उन दिनों दम्पती में किसी बात पर झगड़ा हो गया। दोनों ने पहले एक-दूसरे से कड़वे शब्द कहे और फिर दोनों में बोलचाल बन्द हो गई। देवदत्त ने तुरन्त घर से निकल जाने का निश्चय किया और फ़ैसला सुनाया कि अबकी बार वो अपने दौरे से वापस आ कर शहर में प्रवेश नहीं करेगा। शहर के बाहर दूसरा घर बनवा कर वहीं रहेगा पर कभी भी अपने घर, वसुमती के पास नहीं लौटेगा।    

 

“पति के चले जाने के बाद धीरे-धीरे वसुमती को अपने बर्ताव पर पछतावा होने लगा। एक दिन उसने अपने पति के नाम एक चिट्ठी लिखी जिसमें उसने क्षमा माँगते हुए उससे वापस लौट जाने की विनती की। चिट्ठी दे कर नौकर को रवाना कर दिया और निश्चय कर लिया कि पति के घर लौटने के पहले अन्न का एक दाना नहीं खाएगी। इतने में देवदत्त का काफ़िला काफ़ी दूर निकल गया था। नौकर को पहुँचने में कई दिन लगने वाले थे। वसुमती का स्वास्थ्य धीरे धीरे बिगड़ता जा रहा था। घर वालों के लाख समझाने पर भी वो अपने अनशन पर बनी रही। उसे पति के साथ बिगड़े सम्बन्ध को सुधारने के सिवा और कुछ नहीं सूझता था। आख़िर एक दिन उसने प्राण त्याग दिये। देवदत्त के जल्दी वापस आने की कोई आशा नहीं थी, इसीलिये घर वालों ने वसुमती का दाह-संस्कार कर दिया। जब अस्थियों का कलश नदी में बहाने के लिये ले जाया जा रहा था तब वो हाथ से छूट कर गिर गया और सड़क पर बिखर गया। वसुमती की अस्थियाँ धवलपुर की सड़कों की धूल में मिल गईं।

 

“इधर देवदत्त को भी सन्ताप होने लगा था। उसे भी अपने व्यवहार पर पछतावा था। पत्नी से झगड़कर उसका भी काम में मन नहीं लग रहा था। वो काम बीच में छोड़कर घर लौटना चाहता था। सन्देशवाहक के पहुँचने से पहले ही उसने अपना काफ़िला वापस घर की तरफ़ मोड़ लिया था। घर पहुँच कर जब उसे पत्नी के देहान्त के बारे में पता लगा तो उसे बहुत बड़ा आघात हुआ। उसने अपने आप को अपनी पत्नी के मृत्यु का कारण ठहराया और ख़ुद भी खाना पीना बन्द कर दिया। कुछ ही दिन में उसकी भी मृत्यु हो गई। मरने से पहले उसने भी अपने घरवालों से प्रार्थना की कि उसकी अस्थियों को नदी में न बहा कर अपनी पत्नी के साथ सड़कों पर बिखेर दिया जाए। घरवालों ने उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार उसकी भी अस्थियों को धवलपुर की सड़कों में वसुमती की अस्थियों की राख में मिला दिया। देवदत्त और वसुमती अपनी भूल सुधारने और अपने सम्बन्ध दुबारा मधुर बनाने के प्रयास में प्राण त्यागने के कारण लोगों के मन में पारिवारिक सामंजस्यता के प्रतीक बन गए। लम्बे समय तक लोग उनकी कहानी दोहराते रहे, उनके बारे में गीत गाते रहे, और उनके नाम के त्यौहार मनाते रहे। अपने जीवन में पारिवारिक विषमता के समय में लोग देवदत्त और वसुमती को याद करके प्रेरणा पाते रहे।

 

“इस बात को कई शताब्दियाँ हो चुकी हैं। धीरे-धीरे देवदत्त और वसुमती की याद लोगों के मन में क्षीण हो गई, और अब बड़े-बूढ़ों में भी शायद ही किसी ने उनका नाम सुना हो। लेकिन हमारे धवलपुर की सड़कों की धूल आज भी देवदत्त और वसुमती के अंश से व्याप्त है। इस धूल में आज भी पारिवारिक सम्बन्धों के माधुर्य को बनाए रखने की चमत्कारिक क्षमता है। आपने घर में सुख-शान्ति बनाए रखने का उपाय पूछा था। इस उपाय के लिये आपको कहीं दूर नहीं ढूँढना है, और न ही कोई कठिन काम करना है। उपाय आपके चारों तरफ़ है। मैं आप लोगों को बताता हूँ कि आप देवदत्त और वसुमती के प्रभाव वाली इस धूल से कैसे अपने जीवन में सुख-शान्ति कायम रख सकते हैं। किसी अच्छे दिन सड़क से धूल इकट्ठा कर के एक डब्बे में भर लें। इस डब्बे को अपने पूजा घर में रख लें, और अपनी रोज़ की पूजा में इस धूल की भी पूजा करें। ऐसा करने से आपके घर पर देवदत्त और वसुमती की अनुकम्पा रहेगी, और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उनका प्रभाव आपके परिवार पर बना रहेगा।“

 

बस फिर क्या था। बाबाजी का नुस्ख़ा जल्दी ही शहर भर में फैल गया। ऐसा कौन है जिसके घर में समस्या न हो? लोग सड़कों से धूल बटोर के डब्बे भरने लगे। कुछ ही दिनों में धवलपुर के घर-घर में डब्बा-भर धूल पूजी जाने लगी। यही नहीं, धीरे-धीरे आसपास के गावों और शहरों से भी लोग आकर धवलपुर की धूल डब्बों में भरकर ले जाने लगे। जैसे-जैसे ख़बर फैली कि धवलपुर की चमत्कारिक धूल में पारिवारिक सुख-शान्ति को बनाए रखने की शक्ति है, दूर-दूर से लोग धवलपुर की धूल मँगवाने लगे। भारत के कोने कोने में धवलपुर की धूल की धूम तो मच ही गई, प्रवासी भारतीयों के लिये भी यहाँ से धूल निर्यात होने लगी। धूल के अच्छे दाम मिलने लगे। इसमें अचम्भे की क्या बात है? ऐसा कौन है जिसे अपनी समस्याओं को सुलझाने की आसान तरकीब मिल रही हो तो वो फ़ायदा नहीं उठाएगा?

 

जल्दी ही माँग आपूर्ति से इतनी बढ़ गई कि धवलपुर की सड़कों से धूल ख़त्म हो गई। लोग गर्मी के मौसम का इन्तज़ार करने। गर्मी में जब धूल भरी आँधी आती तो सड़कों पर धूल इकट्ठा करने वालों की भीड़ मच जाती। कुछ ही घंटों में सड़कें फिर साफ़ हो जातीं और साल भर साफ़ रहतीं। सड़कों पर अब झाड़ू नगर निगम के सफ़ाई कर्मचारी नहीं लगाते, बल्कि साधारण लोगों ने इस काम को अपने हाथ में ले लिया। जब थोड़ी सी धूल के भी अच्छे दाम मिल रहे हों तो झाड़ू लगाने में क्या हर्ज़ है? धवलपुर की धूल की महिमा का खुलासा होने का एक फ़ायदा और हुआ कि लोगों ने सड़कों पर कूड़ा फेंकना, थूकना और मूत्रविसर्जन बन्द कर दिया। अपने शहर की पवित्र धूल में आख़िर लोग गन्दा कूड़ा कैसे मिलाते? नगर निगम ने हर गली में कूड़ेदान लगवाए और सार्वजनिक स्थानों में शौचालय बनवाए। लोगों ने सावधानी से उनका उपयोग करना सीखा। धवलपुर में आप घंटों घूमने के बाद भी सड़क पर मूँगफली के छिलके, बस के टिकट, बिस्कुटों के पैकेट या पान की पीक नहीं देख पाएँगे। कूड़ा कूड़ेदान में डाले जाने से शहर से आवारा कुत्ते और चरती गाएँ भी गायब हो गईं। रात को बस-स्टैंड से घर आते हुए लोगों को कुत्तों का डर नहीं है। चलते हुए पैर गोबर में पड़ने का डर नहीं है।

 

इन सब बदलावों से पारिवारिक सुख-शान्ति बढ़ी हो या नहीं, धवलपुर में एक स्पष्ट परिवर्तन ज़रूर हो गया। बिना धूल और कूड़े का शहर देखने में बड़ा अनोखा लगता है, हर शहर से अलग। धवलपुरवासी न सिर्फ़ अपने शहर की धूल की महिमा को लेकर, बल्कि शहर की सफ़ाई को लेकर भी गर्व महसूस करते हैं। बाहर से आने भी ईर्ष्या के साथ बोलते हैं कि उनके शहर की धूल में वो महिमा क्यों नहीं है जो धवलपुर की धूल में है, जिससे उनका शहर भी साफ़-सुथरा हो पाता।

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2 Responses to “लघुकथा – धवलपुर की धूल”

  1. kushal30 Says:

    आपने बहुत अच्छी कहानी लिखी है।
    मै भी कहानियाँ लिखना चाहता हूँ। अब मै सिर्फ आर्टिकल्स लिख रहा हूँ और आगे मै फिक्शन लिखना शुरू करना चाहता हूँ। मुझे लगता है कि आपको देखकर मै फिक्शन लिखना सीख सकता हूँ।

  2. Tiv Says:

    sahi hai. waiting for the next kahaani now 🙂

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