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दही खट्टा है या खट्टी?

22 March, 2016

कुछ दिन पहले मेरे एक सहकर्मी ने बताया कि उनकी अपने दोस्तों से इस बात पर बहस होती रहती है कि दही पुंलिंग शब्द है या स्त्रीलिंग और दोनों पक्षों में इस बात का फ़ैसला नहीं हो पाया है। हिन्दी में नर और मादा मनुष्य और पशु के सूचक शब्दों का लिंग निर्धारण स्पष्ट होता है, लेकिन दूसरे शब्दों में कभी कभी मतभेद हो जाता है। कुछ लोगों को गुस्सा आता है तो दूसरों को गुस्सा आती है। कुछ लोगों को मज़ा आता है तो दूसरों को मज़ा आती है। दही भी ऐसा ही शब्द है। आपको क्या लगता है – दही खट्टा है या खट्टी?

जो लोग दही को पुंलिंग कहते हैं वो इसका कारण ये बताते हैं कि संस्कृत के नपुंसकलिंग शब्दों से उत्पन्न हिन्दी के शब्द पुंलिंग होते हैं, जैसे फल, खेत, बीज इत्यादि, और दही संस्कृत के नपुंसकलिंग शब्द दधि से उत्पन्न है इसलिये इसे पुंलिंग होना चहिये। जो लोग दही को स्त्रीलिंग कहते हैं उनके हिसाब से ईकारान्त होने के कारण दही को नदी, घड़ी, उँगली इत्यादि स्त्रीलिंग शब्दों की श्रेणी में रखना चहिये।

तो पहले वर्ग के लोगों से मेरा प्रश्न ये है कि आपने संस्कृत के नपुंसकलिंग शब्द “पुस्तकम्” को हिन्दी में स्त्रीलिंग क्यों बना दिया? (अच्छी पुस्तक, न कि अच्छा पुस्तक।) अगर पुस्तक आपके नियम का अपवाद हो सकता है तो दही क्यों नहीं? दूसरे वर्ग के लोगों से मेरा प्रश्न ये है कि अगर ईकारान्त होने के कारण दही स्त्रीलिंग है तो आप पानी को स्त्रीलिंग क्यों नहीं कहते? (ठंडा पानी या ठंडी पानी?) तो आख़िरकार दही पुंलिंग है या स्त्रीलिंग?

सही जवाब है – “जो आप चाहें”।

आइये अब संस्कृत से उत्पन्न हिन्दी के कुछ और शब्दों पर नज़र डालें जिनका लिंग संस्कृत से हिन्दी में आते आते परिवर्तित हो गया है।

आत्मा, गरिमा, महिमा – ये संस्कृत में पुंलिंग हैं पर हिन्दी में स्त्रीलिंग हो गए। इसका कारण शायद ये है कि हालाँकि ये संस्कृत में नकारान्त शब्द हैं (आत्मन्, गरिमन्, महिमन्) संस्कृत से इन शब्दों का प्रथमा-विभक्ति एकवचन रूप हिन्दी में लिया गया है, जिससे इनका आकारान्त होने का भ्रम होता है, और हिन्दी में इनको माला, सरिता और कविता जैसे आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों की श्रेणी में डाल दिया गया है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, मनुष्य और पशु वाचक शब्दों में लिंग निर्धारण स्पष्ट होता है। इसलिये राजा, महात्मा, पिता, दाता, दुर्वासा आदि शब्द हिन्दी में संस्कृत की तरह पुंलिंग ही हैं। (वास्तव में ये शब्द भी संस्कृत में आकारान्त नहीं हैं – राजन्, महात्मन्, पितृ, दातृ, दुर्वासस्।)

ध्वनि, निधि, विधि, परिधि, सन्धि, राशि, रश्मि – ये भी संस्कृत में पुंलिंग हैं और हिन्दी में स्त्रीलिंग हो गए हैं। इन्हें इकारान्त होने के कारण स्त्रीलिंग बना दिया गया है, जैसे शक्ति, मति, गति आदि। यही मनुष्य वाचक कवि, मुनि, रवि इत्यादि के साथ नहीं हुआ।

पवन, वायु, ऋतु, जय, विजय – ये संस्कृत में पुंलिंग हैं, इकारान्त या ईकारान्त भी नहीं हैं और पवन, जय और विजय तो पुरुषों के नाम भी रखे जाते हैं। फिर भी वाक्य में स्त्रीलिंग में प्रयोग होते हैं, ये आश्चर्यजनक है। उदाहरण के लिये ये गाना याद करें – “क्यों चलती है पवन…” या ये नारा – “भारत माता की जय!”

व्यक्ति, बन्दी – संस्कृत में स्त्रीलिंग लेकिन हिन्दी में पुंलिंग। इकारान्त या ईकारान्त होते हुए भी इन्हें हिन्दी में पुंलिंग बना दिया गया है। इसका कारण शायद ये है कि इन्हें मनुष्य, लोग, जन, योगी (सं० योगिन्) रोगी (सं० रोगिन्), मन्त्री (सं० मन्त्रिण्) जैसे मनुष्य वाचक शब्दों की तरह समझा गया है जो कि सब पुंलिंग हैं।

इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि भाषा में सही और गलत का फ़ैसला शब्द की उत्पत्ति से नहीं होता बल्कि इस बात से होता है कि क्या प्रचलित है और क्या नहीं। आत्मा, ध्वनि, ऋतु, व्यक्ति आदि शब्दों में जो लिंग हिन्दी में प्रचलित हो चुका है वही सही है चाहे वो जननी भाषा संस्कृत में इनके लिंग से भिन्न क्यों न हो। दही, गुस्सा और मज़ा के मामले में दोनों लिंग प्रचलित हैं इसलिये दोनों सही हैं, जैसा आपको ठीक लगे वैसा प्रयोग कीजिये। दही खट्टा लगे तो खट्टा है और खट्टी लगे तो खट्टी है।