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दही खट्टा है या खट्टी?

22 March, 2016

कुछ दिन पहले मेरे एक सहकर्मी ने बताया कि उनकी अपने दोस्तों से इस बात पर बहस होती रहती है कि दही पुंलिंग शब्द है या स्त्रीलिंग और दोनों पक्षों में इस बात का फ़ैसला नहीं हो पाया है। हिन्दी में नर और मादा मनुष्य और पशु के सूचक शब्दों का लिंग निर्धारण स्पष्ट होता है, लेकिन दूसरे शब्दों में कभी कभी मतभेद हो जाता है। कुछ लोगों को गुस्सा आता है तो दूसरों को गुस्सा आती है। कुछ लोगों को मज़ा आता है तो दूसरों को मज़ा आती है। दही भी ऐसा ही शब्द है। आपको क्या लगता है – दही खट्टा है या खट्टी?

जो लोग दही को पुंलिंग कहते हैं वो इसका कारण ये बताते हैं कि संस्कृत के नपुंसकलिंग शब्दों से उत्पन्न हिन्दी के शब्द पुंलिंग होते हैं, जैसे फल, खेत, बीज इत्यादि, और दही संस्कृत के नपुंसकलिंग शब्द दधि से उत्पन्न है इसलिये इसे पुंलिंग होना चहिये। जो लोग दही को स्त्रीलिंग कहते हैं उनके हिसाब से ईकारान्त होने के कारण दही को नदी, घड़ी, उँगली इत्यादि स्त्रीलिंग शब्दों की श्रेणी में रखना चहिये।

तो पहले वर्ग के लोगों से मेरा प्रश्न ये है कि आपने संस्कृत के नपुंसकलिंग शब्द “पुस्तकम्” को हिन्दी में स्त्रीलिंग क्यों बना दिया? (अच्छी पुस्तक, न कि अच्छा पुस्तक।) अगर पुस्तक आपके नियम का अपवाद हो सकता है तो दही क्यों नहीं? दूसरे वर्ग के लोगों से मेरा प्रश्न ये है कि अगर ईकारान्त होने के कारण दही स्त्रीलिंग है तो आप पानी को स्त्रीलिंग क्यों नहीं कहते? (ठंडा पानी या ठंडी पानी?) तो आख़िरकार दही पुंलिंग है या स्त्रीलिंग?

सही जवाब है – “जो आप चाहें”।

आइये अब संस्कृत से उत्पन्न हिन्दी के कुछ और शब्दों पर नज़र डालें जिनका लिंग संस्कृत से हिन्दी में आते आते परिवर्तित हो गया है।

आत्मा, गरिमा, महिमा – ये संस्कृत में पुंलिंग हैं पर हिन्दी में स्त्रीलिंग हो गए। इसका कारण शायद ये है कि हालाँकि ये संस्कृत में नकारान्त शब्द हैं (आत्मन्, गरिमन्, महिमन्) संस्कृत से इन शब्दों का प्रथमा-विभक्ति एकवचन रूप हिन्दी में लिया गया है, जिससे इनका आकारान्त होने का भ्रम होता है, और हिन्दी में इनको माला, सरिता और कविता जैसे आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों की श्रेणी में डाल दिया गया है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, मनुष्य और पशु वाचक शब्दों में लिंग निर्धारण स्पष्ट होता है। इसलिये राजा, महात्मा, पिता, दाता, दुर्वासा आदि शब्द हिन्दी में संस्कृत की तरह पुंलिंग ही हैं। (वास्तव में ये शब्द भी संस्कृत में आकारान्त नहीं हैं – राजन्, महात्मन्, पितृ, दातृ, दुर्वासस्।)

ध्वनि, निधि, विधि, परिधि, सन्धि, राशि, रश्मि – ये भी संस्कृत में पुंलिंग हैं और हिन्दी में स्त्रीलिंग हो गए हैं। इन्हें इकारान्त होने के कारण स्त्रीलिंग बना दिया गया है, जैसे शक्ति, मति, गति आदि। यही मनुष्य वाचक कवि, मुनि, रवि इत्यादि के साथ नहीं हुआ।

पवन, वायु, ऋतु, जय, विजय – ये संस्कृत में पुंलिंग हैं, इकारान्त या ईकारान्त भी नहीं हैं और पवन, जय और विजय तो पुरुषों के नाम भी रखे जाते हैं। फिर भी वाक्य में स्त्रीलिंग में प्रयोग होते हैं, ये आश्चर्यजनक है। उदाहरण के लिये ये गाना याद करें – “क्यों चलती है पवन…” या ये नारा – “भारत माता की जय!”

व्यक्ति, बन्दी – संस्कृत में स्त्रीलिंग लेकिन हिन्दी में पुंलिंग। इकारान्त या ईकारान्त होते हुए भी इन्हें हिन्दी में पुंलिंग बना दिया गया है। इसका कारण शायद ये है कि इन्हें मनुष्य, लोग, जन, योगी (सं० योगिन्) रोगी (सं० रोगिन्), मन्त्री (सं० मन्त्रिण्) जैसे मनुष्य वाचक शब्दों की तरह समझा गया है जो कि सब पुंलिंग हैं।

इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि भाषा में सही और गलत का फ़ैसला शब्द की उत्पत्ति से नहीं होता बल्कि इस बात से होता है कि क्या प्रचलित है और क्या नहीं। आत्मा, ध्वनि, ऋतु, व्यक्ति आदि शब्दों में जो लिंग हिन्दी में प्रचलित हो चुका है वही सही है चाहे वो जननी भाषा संस्कृत में इनके लिंग से भिन्न क्यों न हो। दही, गुस्सा और मज़ा के मामले में दोनों लिंग प्रचलित हैं इसलिये दोनों सही हैं, जैसा आपको ठीक लगे वैसा प्रयोग कीजिये। दही खट्टा लगे तो खट्टा है और खट्टी लगे तो खट्टी है।

लघुकथा – धवलपुर की धूल

1 November, 2013

धवलपुर की धूल

 

पहले धवलपुर किसी भी दूसरे छोटे शहर जैसा था। यहाँ की सड़कों से गुज़रते हुए वही नज़ारे सामने आते थे जो किसी भी छोटे भारतीय शहर में नज़र आते हैं। सँकरी गलियों से जूझती गाड़ियाँ, आपस में सँटे हुए एक या दो मंज़िला मकान, मोबाइल फ़ोन सेवाओं के विज्ञापन, फ़िल्मों और नेताओं के पोस्टर, दो-चार सार्वजनिक पार्क वगैरा। ये सब नज़ारे अब भी वैसे ही हैं लेकिन पिछले कुछ सालों में एक बदलाव आया है। जिसने तब का धवलपुर देखा हो वो आज अगर यहाँ आए तो पहचानेगा ही नहीं कि ये वही शहर है। धवलपुरवासियों को अपना शहर अगर ख़ास लगता है तो ये स्वाभाविक है लेकिन अब बाहर वालों की नज़रों में भी इस शहर की ख़ास जगह बन गई है। अब ये ख़ास बात क्या है ये तो वो बाबाजी ही जानें जिनके यहाँ आने पर ये बदलाव शुरू हुए थे। उन्होंने कुछ तो देखा होगा इस शहर में जो उन्होंने कई साल इधर-उधर घूमने क बाद इस शहर को अपना घर बनाया।

 

बाबाजी के धवलपुर आने के कुछ ही दिनों में उनके रहने और खाने का इन्तज़ाम हो गया था। ये उनके व्यक्तित्व का प्रभाव था या भगवे रंग के कपड़ों का, इसका निर्णय तो आप ख़ुद ही करें, लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि उनके यहाँ होने से जैसे धवलपुर की कोई कमी पूरी होती हो।   

 

बाबाजी अपने बारे में कभी कोई बात नहीं करते हैं, फिर भी जो थोड़ी बहुत जानकारी इधर-उधर से सुनकर इकट्ठी हो पाई है वो ये है कि वो पहले सरकारी नौकरी में थे और इसी प्रान्त के किसी शहर में रहते थे। पत्नी के स्वर्गवास और बच्चों के अपने पैरों पर खड़े हो जाने पर उनमें वैराग्य जागा और सेवा-निवृत्ति के तीन साल पहले ही नौकरी छोड़कर हिमालय चले गए। बारह साल वहाँ रहने के बाद उन्होंने देशाटन शुरू कर दिया। एक शहर से दूसरे शहर जाते पर कहीं भी दो-तीन महीनों से ज़्यादा नहीं रुकते। अन्त में जब धवलपुर आए तो न जाने उन्होंने यहाँ क्या देखा कि पिछले दो साल से इसी शहर में रह गए हैं।

 

लेकिन यहाँ हम बात बाबाजी की नहीं कर रहे हैं, बल्कि धवलपुर और उसमें आए बदलाव की कर रहे हैं। इस बदलाव के सिलसिले की शुरुआत उस दिन हुई जब बाबाजी हमेशा की तरह शाम के भजन के बाद लोगों से बैठे बातें कर रहे थे। लगभग तीस लोगों का समूह था। किसी ने, शायद अपने निजी जीवन की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए बाबाजी से पूछा कि घर में सुख-शान्ति बनाए रखने का क्या उपाय है। बाबाजी गम्भीर हो गए और कोई जवाब नहीं दिया, उल्टा सब को घर चले जाने को कह दिया। लोगों ने पूछा कि क्या हुआ पर उन्होंने कुछ नहीं कहा, और उस शाम बैठक जल्दी ख़त्म हो गई। अगले दिन भजन के बाद बाबाजी ने उस सवाल के जवाब में एक कहानी सुनानी शुरू की –

 

“धवलपुर की प्राचीनता तो आप लोग जानते ही हैं। राजा धवलप्रताप ने दसवीं शताब्दी में अपनी राजधानी शूलपुर से बदलकर धवलपुर को बसाया था। धवलप्रताप के वंश में तीसरी पुश्त में राजा रुद्रप्रताप हुए थे, जिनके राज में धवलपुर की समृद्धि और भी बढ़ गई थी, और ये इस प्रान्त का मुख्य व्यापारिक केन्द्र बन गया था। शहर के धनिकों में एक नाम नवयुवक सेठ देवदत्त का था। व्यापार के काम से उसको दूर दूर के शहरों में जाना होता था। हर साल बरसात के बाद वो अपने कर्मचारियों के साथ मिल कर काफ़िला तैयार करता, बैलगाड़ियों पर माल लादता और शहर से निकल पड़ता। अलग-अलग शहर जा कर माल ख़रीदता-बेचता और जब सर्दी के मौसम में वसन्त में झलक दिखने लगे उन दिनों अपने शहर वापस लौटता। बाकी के सात-आठ महीने वो धावलपुर में रहकर यहाँ का काम सँभलता। उसकी अनुपस्थिति में उसकी पत्नी वसुमती उसकी राह देखती और वसन्त ऋतु के जल्दी आने के कामना करती। एक बार शरद् ऋतु में जब देवदत्त अपने दौरे पर जाने की तैयारी कर रहा था, उन दिनों दम्पती में किसी बात पर झगड़ा हो गया। दोनों ने पहले एक-दूसरे से कड़वे शब्द कहे और फिर दोनों में बोलचाल बन्द हो गई। देवदत्त ने तुरन्त घर से निकल जाने का निश्चय किया और फ़ैसला सुनाया कि अबकी बार वो अपने दौरे से वापस आ कर शहर में प्रवेश नहीं करेगा। शहर के बाहर दूसरा घर बनवा कर वहीं रहेगा पर कभी भी अपने घर, वसुमती के पास नहीं लौटेगा।    

 

“पति के चले जाने के बाद धीरे-धीरे वसुमती को अपने बर्ताव पर पछतावा होने लगा। एक दिन उसने अपने पति के नाम एक चिट्ठी लिखी जिसमें उसने क्षमा माँगते हुए उससे वापस लौट जाने की विनती की। चिट्ठी दे कर नौकर को रवाना कर दिया और निश्चय कर लिया कि पति के घर लौटने के पहले अन्न का एक दाना नहीं खाएगी। इतने में देवदत्त का काफ़िला काफ़ी दूर निकल गया था। नौकर को पहुँचने में कई दिन लगने वाले थे। वसुमती का स्वास्थ्य धीरे धीरे बिगड़ता जा रहा था। घर वालों के लाख समझाने पर भी वो अपने अनशन पर बनी रही। उसे पति के साथ बिगड़े सम्बन्ध को सुधारने के सिवा और कुछ नहीं सूझता था। आख़िर एक दिन उसने प्राण त्याग दिये। देवदत्त के जल्दी वापस आने की कोई आशा नहीं थी, इसीलिये घर वालों ने वसुमती का दाह-संस्कार कर दिया। जब अस्थियों का कलश नदी में बहाने के लिये ले जाया जा रहा था तब वो हाथ से छूट कर गिर गया और सड़क पर बिखर गया। वसुमती की अस्थियाँ धवलपुर की सड़कों की धूल में मिल गईं।

 

“इधर देवदत्त को भी सन्ताप होने लगा था। उसे भी अपने व्यवहार पर पछतावा था। पत्नी से झगड़कर उसका भी काम में मन नहीं लग रहा था। वो काम बीच में छोड़कर घर लौटना चाहता था। सन्देशवाहक के पहुँचने से पहले ही उसने अपना काफ़िला वापस घर की तरफ़ मोड़ लिया था। घर पहुँच कर जब उसे पत्नी के देहान्त के बारे में पता लगा तो उसे बहुत बड़ा आघात हुआ। उसने अपने आप को अपनी पत्नी के मृत्यु का कारण ठहराया और ख़ुद भी खाना पीना बन्द कर दिया। कुछ ही दिन में उसकी भी मृत्यु हो गई। मरने से पहले उसने भी अपने घरवालों से प्रार्थना की कि उसकी अस्थियों को नदी में न बहा कर अपनी पत्नी के साथ सड़कों पर बिखेर दिया जाए। घरवालों ने उसकी अन्तिम इच्छा के अनुसार उसकी भी अस्थियों को धवलपुर की सड़कों में वसुमती की अस्थियों की राख में मिला दिया। देवदत्त और वसुमती अपनी भूल सुधारने और अपने सम्बन्ध दुबारा मधुर बनाने के प्रयास में प्राण त्यागने के कारण लोगों के मन में पारिवारिक सामंजस्यता के प्रतीक बन गए। लम्बे समय तक लोग उनकी कहानी दोहराते रहे, उनके बारे में गीत गाते रहे, और उनके नाम के त्यौहार मनाते रहे। अपने जीवन में पारिवारिक विषमता के समय में लोग देवदत्त और वसुमती को याद करके प्रेरणा पाते रहे।

 

“इस बात को कई शताब्दियाँ हो चुकी हैं। धीरे-धीरे देवदत्त और वसुमती की याद लोगों के मन में क्षीण हो गई, और अब बड़े-बूढ़ों में भी शायद ही किसी ने उनका नाम सुना हो। लेकिन हमारे धवलपुर की सड़कों की धूल आज भी देवदत्त और वसुमती के अंश से व्याप्त है। इस धूल में आज भी पारिवारिक सम्बन्धों के माधुर्य को बनाए रखने की चमत्कारिक क्षमता है। आपने घर में सुख-शान्ति बनाए रखने का उपाय पूछा था। इस उपाय के लिये आपको कहीं दूर नहीं ढूँढना है, और न ही कोई कठिन काम करना है। उपाय आपके चारों तरफ़ है। मैं आप लोगों को बताता हूँ कि आप देवदत्त और वसुमती के प्रभाव वाली इस धूल से कैसे अपने जीवन में सुख-शान्ति कायम रख सकते हैं। किसी अच्छे दिन सड़क से धूल इकट्ठा कर के एक डब्बे में भर लें। इस डब्बे को अपने पूजा घर में रख लें, और अपनी रोज़ की पूजा में इस धूल की भी पूजा करें। ऐसा करने से आपके घर पर देवदत्त और वसुमती की अनुकम्पा रहेगी, और प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उनका प्रभाव आपके परिवार पर बना रहेगा।“

 

बस फिर क्या था। बाबाजी का नुस्ख़ा जल्दी ही शहर भर में फैल गया। ऐसा कौन है जिसके घर में समस्या न हो? लोग सड़कों से धूल बटोर के डब्बे भरने लगे। कुछ ही दिनों में धवलपुर के घर-घर में डब्बा-भर धूल पूजी जाने लगी। यही नहीं, धीरे-धीरे आसपास के गावों और शहरों से भी लोग आकर धवलपुर की धूल डब्बों में भरकर ले जाने लगे। जैसे-जैसे ख़बर फैली कि धवलपुर की चमत्कारिक धूल में पारिवारिक सुख-शान्ति को बनाए रखने की शक्ति है, दूर-दूर से लोग धवलपुर की धूल मँगवाने लगे। भारत के कोने कोने में धवलपुर की धूल की धूम तो मच ही गई, प्रवासी भारतीयों के लिये भी यहाँ से धूल निर्यात होने लगी। धूल के अच्छे दाम मिलने लगे। इसमें अचम्भे की क्या बात है? ऐसा कौन है जिसे अपनी समस्याओं को सुलझाने की आसान तरकीब मिल रही हो तो वो फ़ायदा नहीं उठाएगा?

 

जल्दी ही माँग आपूर्ति से इतनी बढ़ गई कि धवलपुर की सड़कों से धूल ख़त्म हो गई। लोग गर्मी के मौसम का इन्तज़ार करने। गर्मी में जब धूल भरी आँधी आती तो सड़कों पर धूल इकट्ठा करने वालों की भीड़ मच जाती। कुछ ही घंटों में सड़कें फिर साफ़ हो जातीं और साल भर साफ़ रहतीं। सड़कों पर अब झाड़ू नगर निगम के सफ़ाई कर्मचारी नहीं लगाते, बल्कि साधारण लोगों ने इस काम को अपने हाथ में ले लिया। जब थोड़ी सी धूल के भी अच्छे दाम मिल रहे हों तो झाड़ू लगाने में क्या हर्ज़ है? धवलपुर की धूल की महिमा का खुलासा होने का एक फ़ायदा और हुआ कि लोगों ने सड़कों पर कूड़ा फेंकना, थूकना और मूत्रविसर्जन बन्द कर दिया। अपने शहर की पवित्र धूल में आख़िर लोग गन्दा कूड़ा कैसे मिलाते? नगर निगम ने हर गली में कूड़ेदान लगवाए और सार्वजनिक स्थानों में शौचालय बनवाए। लोगों ने सावधानी से उनका उपयोग करना सीखा। धवलपुर में आप घंटों घूमने के बाद भी सड़क पर मूँगफली के छिलके, बस के टिकट, बिस्कुटों के पैकेट या पान की पीक नहीं देख पाएँगे। कूड़ा कूड़ेदान में डाले जाने से शहर से आवारा कुत्ते और चरती गाएँ भी गायब हो गईं। रात को बस-स्टैंड से घर आते हुए लोगों को कुत्तों का डर नहीं है। चलते हुए पैर गोबर में पड़ने का डर नहीं है।

 

इन सब बदलावों से पारिवारिक सुख-शान्ति बढ़ी हो या नहीं, धवलपुर में एक स्पष्ट परिवर्तन ज़रूर हो गया। बिना धूल और कूड़े का शहर देखने में बड़ा अनोखा लगता है, हर शहर से अलग। धवलपुरवासी न सिर्फ़ अपने शहर की धूल की महिमा को लेकर, बल्कि शहर की सफ़ाई को लेकर भी गर्व महसूस करते हैं। बाहर से आने भी ईर्ष्या के साथ बोलते हैं कि उनके शहर की धूल में वो महिमा क्यों नहीं है जो धवलपुर की धूल में है, जिससे उनका शहर भी साफ़-सुथरा हो पाता।

हिन्दी में क्रियापद का लिंग

17 May, 2012

हिन्दी में क्रियापद का लिंग

ये वाक्य देखें –

महेश जाता है। वर्तमान काल, अकर्मक
महेश गया। भूत काल, अकर्मक
महेश चावल खाता है। वर्तमान काल, सकर्मक
महेश रोटी खाता है। वर्तमान काल, सकर्मक
महेश ने चावल खाया। भूत काल, सकर्मक
महेश ने रोटी खाई। भूत काल, सकर्मक

ऊपर के सभी वाक्यों में कर्ता (महेश) पुल्लिंग है। वाक्य ६ के अलावा सभी वाक्यों में क्रियापद भी पुल्लिंग है (जाता है/गया/खाता है/खाया)। वाक्य ६ में क्रियापद स्त्रीलिंग है (खाई)।

अब ये वाक्य देखें जिनमें कर्ता स्त्रीलिंग है।

सुधा जाती है। वर्तमान काल, अकर्मक
सुधा गई। भूत काल, अकर्मक
सुधा चावल खाती है। वर्तमान काल, सकर्मक
१० सुधा रोटी खाती है। वर्तमान काल, सकर्मक
११ सुधा ने चावल खाया। भूत काल, सकर्मक
१२ सुधा ने रोटी खाई। भूत काल, सकर्मक

इन वाक्यों में भी क्रियापद कर्ता के अनुरूप स्त्रीलिंग है, केवल वाक्य ११ को छोड़ कर। ध्यान से देखें तो दोनों अपवाद वाक्यों में क्रियापद के लिंग की कर्ता से नहीं बल्कि कर्म से समरूपता है।

६ महेश ने रोटी खाई। (कर्म = रोटी, स्त्रीलिंग)

११ सुधा ने चावल खाया। (कर्म = चावल, पुल्लिंग)

संक्षेप में ये कहा जा सकता है कि हिन्दी में वर्तमान काल में अकर्मक और सकर्मक क्रियापदों का लिंग कर्ता से निर्धारित होता है। लेकिन भूतकाल में अकर्मक क्रियापद का लिंग कर्ता से और सकर्मक क्रियापद का कर्म से निर्धारित होता है।

ये तो वर्णन हुआ नियम का। नियम की उत्पत्ति के लिये संस्कृत वाक्यों को देखें –

महेशः गच्छति। वर्तमान काल, अकर्मक
महेशः अगच्छत्। भूत काल, अकर्मक
महेशः ओदनं खादति। वर्तमान काल, सकर्मक
महेशः रोटिकां खादति। वर्तमान काल, सकर्मक
महेशः ओदनम् अखादत्। भूत काल, सकर्मक
महेशः रोटिकाम् अखादत्। भूत काल, सकर्मक
सुधा गच्छति। वर्तमान काल, अकर्मक
सुधा अगच्छत्। भूत काल, अकर्मक
सुधा ओदनं खादति। वर्तमान काल, सकर्मक
१० सुधा रोटिकां खादति। वर्तमान काल, सकर्मक
११ सुधा ओदनम् अखादत्। भूत काल, सकर्मक
१२ सुधा रोटिकाम् अखादत्। भूत काल, सकर्मक

संस्कृत में क्रियापद लिंगरहित होता है इसलिये कर्ता चाहे पुल्लिंग हो या स्त्रीलिंग, क्रियापद एक सा होता है। लेकिन संस्कृत में भूतकालिक वाक्यों का एक और स्वरूप प्रचलित है जिसमें लङ्लकार की जगह ’क्‍त’ प्रत्यय से भूतकाल का भाव प्रकट किया जाता है। इस स्वरूप के भूतकालिक वाक्यों के उदाहरण देखें –

महेशः गतः। भूत काल, अकर्मक
महेशेन ओदनं खादितम्। भूत काल, सकर्मक
महेशेन रोटिका खादिता। भूत काल, सकर्मक
सुधा गता। भूत काल, अकर्मक
११ सुधया ओदनं खादितम्। भूत काल, सकर्मक
१२ सुधया रोटिका खादिता। भूत काल, सकर्मक

यहाँ अकर्मक वाक्य कर्तृवाच्य में है, जबकि सकर्मक वाक्य कर्मवाच्य में है। इससे अकर्मक वाक्यों में क्रिया कर्ता से निर्धारित ह्आ है और सकर्मक वाक्यों में कर्म से। शायद हिन्दी में भूतकालिक वाक्य की उत्पत्ति संस्कृत के ’क्‍त’ प्रत्यय वाले स्वरूप से हुई है, जिससे अकर्मक और सकर्मक क्रियापदों के लिंग-निर्धारण में विषमता आई है।

अब/अभी

27 April, 2012

‘Now को हिन्दी में क्या कहते हैं? ‘अब’ या ‘अभी’? क्या दोनों में कोई अन्तर है?

शब्दकोश* के अनुसार इनकी परिभाषाएँ ये हैं

अब –now, just now, at this moment

अभी – at present, just now, newly, recently, even now

अर्थात्, शब्दकोश के अनुसार इन दोनों शब्दों में कोई भेद नहीं है। लेकिन ये उदाहरण देखें। यहाँ दो वाक्य हैं जिनमें अंग्रेज़ी का ‘now’ शब्द है लेकिन हिन्दी में उसके दो अलग-अलग पर्याय हैं

 

“Priya has turned four. She goes to school now.”

प्रिया चार साल की हो गई है। अब वो स्कूल जाती है।

“Don’t go now, it’s too hot outside.”

अभी मत जाओ, बाहर बहुत गरमी है।

जैसा कि आप देख सकते हैं, पहले उदाहरण में ‘अब’ की जगह ‘अभी’ नहीं आ सकता। उसी तरह दूसरे उदाहरण में ‘अब’ अनुचित है।

‘अब’ का प्रयोग वहाँ होता है जहाँ वर्तमान परिस्थिति की पूर्वकालिक परिस्थिति से तुलना की जा रही हो। (प्रिया पहले स्कूल नहीं जाती थी, अब जाती है।) ‘अभी’ का प्रयोग वर्तमान समय को निर्दिष्ट करने के लिये होता है।

कुछ और उदाहरण:

अब तो है तुमसे हर ख़ुशी अपनी।

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों।

अभी न जाओ छोड़ कर।

अभी तो मैं जवान हूँ।

 

पाठक अगर अपवाद ढूँढकर बताएँ तो मुझे ख़ुशी होगी।

* Bhargava’s Standard Illustrated Dictionary, Hindi-English, Shree Ganga Pustakalaya, Varanasi

देवनागरी के कुछ अक्षरों के बारे में

17 July, 2011

कुछ समय पहले मेरे एक दोस्त ने देवनागरी के कुछ अक्षरों के बारे में ये सवाल पूछे। वो सवाल और मेरे जवाब इस लेख का विषय हैं।

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Hi,

I have some questions about the Hindi/Devanagari letters अः ऋ ङ ञ ष क्ष त्र ज्ञ

1. Some of these characters are not/never used in Hindi. Are they more common in other Indian languages/scripts?

2. I assume these have come from Sanskrit but I am not sure what their correct pronunciation is. Since ‘correct’ is a very subjective term, let’s ask what their original or old/older/oldest known pronunciation is?

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 ये बात सही नहीं है की “Some of the characters are not/never used in Hindi.” ये सारे ही हिंदी में इस्तेमाल किये जाते हैं। सवाल शायद ये है कि ये क्यों इस्तेमाल किये जाते हैं। 

एक एक कर के बात करते हैं …
अः 
विसर्ग (अः) का इस्तेमाल सभी भाषाओं में सिर्फ़ तत्सम शब्दों में होता है। (तत्सम – वो शब्द जो संस्कृत से बिना किसी परिवर्तन के लिये गए हैं।)
इसका  इस्तेमाल सिर्फ़ मात्रा के रूप में होता है। जैसे दुःख, क्रमशः, पुनः वग़ैरा। उच्चारण ह् की तरह होता है। सवाल ये है की जब ह् मौजूद है तो अः किस काम का है। वो इसलिए कि जबकि स्वतन्त्र रूप में विसर्ग और ह् एक जैसे उच्चारित होते हैं, संस्कृत में संधि करते हुए विसर्ग का रूप बदलता रहता है, इसलिए इसको ह् से अलग दिखाने के लिए अलग चिह्न (‍ः) बनाया गया है –
कः + अपि = कोsपि
दुः + यः + धन = दुर्योधन 
दुः + शासन = दुश्शासन
दूसरे शब्दों में, इसका ह् से भेद ध्वन्यात्मक नहीं, वैयाकरणिक है।  

 
इसका इस्तेमाल भी तत्सम शब्दों में ही होता है, जैसे ऋषि, कृपा इत्यादि। इसकी गिनती स्वरों में की जाती है हालाँकि इसका आधुनिक उच्चारण एक व्यंजन+स्वर संयोजन की तरह होता है – 
उत्तर भारत : रि/री
दक्षिण भारत + महाराष्ट्र + गुजरात : रु/रू 
लेकिन पुराने ज़माने में ये वाकई एक स्वर था, और इसका उच्चारण इस तरह होता होगा कि जीभ को ’र’ बोलने की अवस्था में रखें लेकिन ’अ’ बोलने की कोशिश करें। इसका उदाहरण अमरीकी शैली की अंग्रेज़ी में curb शब्द में क और ब के बीच के ’r’ में मिलता है। 
curb (अमरीकी उच्चरण) को संस्कृत में इस तरह लिखा जाता (अगर लिखने वाला २०००-३००० साल पहले का होता) ‘ कृब् ‘।
उच्चारण समय के साथ बदलना हर भाषा में स्वाभाविक है लेकिन शास्त्रीय नियम (कि ऋ स्वर है) और वर्तनी (spelling) कम परिवर्तनशील होते हैं।

ङ और 
हिंदी की वर्णमाला के क से म तक के २५ अक्षर एक periodic table में व्यवस्थित हैं। अगर कोई अक्षर बहुत कम या कभी नहीं इस्तेमाल होता है, तो भी उसकी जगह ख़ाली नहीं छोड़ी जाती। इन दोनों अक्षरों का इस्तेमाल स्वायत्त रूप में नहीं होता लेकिन कुछ शब्दों में अप्रत्यक्ष होता है, जैसे – 
गंगा = गङ्गा

चंचल = चञ्चल

उसी तरह, जिस तरह संबंध = सम्बन्ध 
ङ – क, ख, ग, घ के अनुरूप नासिक्य ध्वनि है, और ञ – च, छ, ज, झ के अनुरूप। उसी तरह जिस तरह म – प, फ, ब, भ के।


इसका श के साथ भेद मुख्य रूप से सैद्धान्तिक है। सुनने में ज़्यादा अलग नहीं लगता, लेकिन उच्चरण-स्थान अलग हैं। श (और च छ ज झ ञ) तालु से (palate – roof of the mouth)। ष (और ट ठ ड ढ ण) मूर्धा से (alveolar ridge – the raised part just behind the teeth). इसीलिये चवर्ग के साथ हमेशा श आता है और टवर्ग के साथ हमेशा ष। जैसे – 
निश्चय, पश्चात, आश्चर्य 
निष्ठुर, कष्ट 

क्ष त्र और ज्ञ
ये संयुक्ताक्षर हैं।
क्ष = क् + ष 
त्र = त् + र
ज्ञ = ज् + ञ
देवनागरी और भारत की बाकी आधुनिक लिपियाँ (उर्दू के अलावा) ब्राह्मी से अवतरित हुई हैं। और ब्राह्मी में संयुक्ताक्षर लिखने का तरीका ये था की पहले व्यंजन को ऊपर लिखा जाता था और दूसरे को उससे लगा के उसके नीचे। लेकिन समय के साथ साथ अक्षरों की बनावट बदलती गयी। (इसलिए आज इतनी सारी लिपियाँ हैं।) देवनगरी में कुछ संयुक्ताक्षरों का स्वरुप इस तरह से बदला की उसके संघटक व्यंजनों को अब पहचाना नहीं जा सकता, जैसा की इन तीनों (क्ष त्र और ज्ञ) में हुआ है। इसकी सम्भावना काफ़ी कम है की सभी लिपियों में इन्ही तीनों का यही हाल हुआ होगा। इसलिए, उदहारण की लिए तेलुगु में इन तीनों की बनावट स्पष्ट है – 

(क्ष) క్ష = క + ష 
(त्र) త్ర = త + ర 
(ज्ञ) జ్ఞ = జ + ఞ

तेलुगु लिपि में ये तीन अपवाद नहीं हैं जैसे कि देवनागरी में हैं।

ज्ञ के बारे में थोड़ी और जानकारी। हिंदी में इसका आधुनिक अच्चारण ‘ग्य’ है और दक्षिण भारतीय भाषाओँ में ’ग्न्य’ है। समय के साथ उच्चारण बदलता रहता है। पुराने ज़माने में, जब लोगों ने लिखना शुरू किया होगा तब सचमुच ’ज्‍ञ’ उच्चारण करते होंगे। लेकिन उच्चारण इसके पहले भी बदलता रहा था। और पहले ‘ग्न’ की तरह बोलते होंगे। इसकी प्रतिध्वनि अंग्रेजी के know, agnostic इत्यादि शब्दों की वर्तनी में मिलती है।

भोजपुरी और पंजाबी

7 November, 2010

आसपास की भाषाएँ अगर मिलती-जुलती हों तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है, लेकिन कभी कभी दो दूर की भाषाओं में कुछ मिलते जुलते लक्षण दिखाई देते हैं जो उन दोनों के बीच की भाषा से अलग होते हैं। यहाँ बिहार की भोजपुरी और पंजाब की पंजाबी के कुछ मिलते जुलते शब्दों को देखें, जो हिन्दी से अलग हैं –

ਪੰਜਾਬੀ (पंजाबी) भोजपुरी हिन्दी
ਨੇੜੇ (नेड़े) नियरे पास
ਲੂਣ (लूण) नून नमक
ਧੀ (धी) धीया बेटी
ਘਿਓ (घिओ) घीव घी
ਬੱਤੀ ਬਾਲਨਾ (बत्ती बालना) बत्ती बारल बत्ती जलाना
ਠੀਪਾ (ठीपा) ठेपी ढक्कन
ਤਾਕੀ (ताकी) ताखा आला (niche)
ਚੌਕਾ (चौका) चौका रसोई
ਗੁੱਡੀ (गुड्डी) गुड्डी पतंग
ਮੋਰੀ  (मोरी) मोरी नाली

Regular sound change

15 October, 2010

Examples of regular sound change in Punjabi and Hindi

The first column contains Sanskrit words with a consonant followed by a short vowel followed by two dissimilar consonants (c1vc2c3).

The second column contains the corresponding Punjabi word that show assimilation (परसवर्ण सन्धिः) of the last two consonants (c1vc2c2)

The third column has the Hindi word with the short vowel changed to its long form (with optional nasalisation) and the consonant cluster simplified to a single consonant (c1Vc2). The length of the syllable (मात्रा) remains the same.

Sanskrit

Punjabi   [Devanagari transliteration]

Hindi

c1vc2c3

c1vc2c2

c1Vc2

हस्त

ਹੱਥ  [हत्थ]

हाथ

सप्त

ਸੱਤ  [सत्त]

सात

अष्ट

ਅੱਠ  [अट्ठ]

आठ

कर्तन

ਕੱਟਨਾ  [कट्टना]

काटना

कर्म

ਕੰਮ  [कम्म]

काम

अर्ध

ਅੱਧਾ  [अद्धा]

आधा

अद्य

ਅੱਜ  [अज्ज]

आज

चन्द्र

ਚੰਨ  [चन्न]

चाँद

सर्प

ਸੱਪ  [सप्प]

साँप

अक्षि

ਅੱਖ  [अक्ख]

आँख

सिद्ध?

ਸਿੱਧਾ  [सिद्धा]

सीधा

दुग्ध

ਦੁੱਧ  [दुद्ध]

दूध

पुत्र

ਪੁੱਤ  [पुत्त]

पूत

ਜਿੱਤਨਾ  [जित्तना]

जीतना

ਤਿੰਨ  [तिन्न]

तीन

सुप्त

ਸੁੱਤਾ  [सुत्ता]

ਘੁੰਮਨਾ  [घुम्मना]

घूमना

ਧੁੱਪ  [धुप्प]

धूप

Spelling in Hindi

30 April, 2010
ये बात सन् ८४ या ८५ की है जब मैं पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ता था। हिंदी की अध्यापिका एक एक बच्चे को बुला के ब्लैकबोर्ड पर एक एक शब्द लिखवा रही थीं। एक लड़के को “ऋषि” शब्द लिखने को कहा गया और उसने लिखा “रिशी”। मैं “ऋषि” की स्पेलिंग अच्छी तरह से जानता था इसलिये ये देख कर हँस पड़ा कि जो तीन ग़लतियाँ संभव थीं वो तीनों उस लड़के ने कर दी थीं। इन “ग़लतियों” का कारण समझने की कोशिश करते हैं।

१. ऋ पुराने ज़माने में एक शुद्ध स्वर होता था, लेकिन इसका आधुनिक उच्चारण एक व्यंजन+स्वर के जैसा है – दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और गुजरात में रु की तरह और बाक़ी उत्तर भारत में रि की तरह। इसलिये उस लड़के का ऋ को रि में बदल देना स्वाभाविक था।

२. श और ष में फ़र्क़ मात्र सैद्धांतिक है – श का उच्चारण स्थान तालु (palate)  माना जाता है और ष का मूर्धा (alveolar ridge)। आम बोलचाल में दोनों की आवाज़ों में ज़्यादा फ़र्क़ सुनाई नहीं देता। हिंदी में श ष से ज़्यादा प्रचुर है इसलिये उस लड़के ने श का इस्तेमाल किया।

३. हिंदी में कोई शब्द इकारांत हो या ईकारांत, आम बोलचाल में अंत्य इ/ई की अवधि में भेद नहीं किया जाता है।  किसी से आप ऋषि और ख़ुशी शब्द अलग अलग बोलने को कहेंगे तो वो ज़रूर सावधानी से छोटी और बड़ी मात्राओं में अंतर प्रदर्शित करेगा, लेकिन अगर ये किसी वाक्य में सहज रूप से बोले जाएँ तो कोई फ़र्क़ नहीं सुनाई देगा। उदाहरण के लिये ये वाक्य बोलकर देखें – “मेनका को देख कर ऋषि को ख़ुशी हुई”। दोनों स्थितियों में मात्रा प्राय: बड़ी (ई) ही होगी। मेरे उस सहपाठी की वर्तनी भी इसी प्रवृत्ति को दिखलाती है।

जिसने ऋषि शब्द को पहले कभी लिखा हुआ नहीं देखा हो (पाँच-छ: साल के बच्चे से ऐसी उम्मीद करना अनुचित नहीं है) उसके लिये “रिशी” लिखना स्वाभाविक है. उसने अपने स्वर और वर्तनी के ज्ञान का सही इस्तेमाल करते हुए अपनी तरफ़ से ठीक ही लिखा था। कौन कहता है कि हिंदी में लिखित शब्द और मौखिक उच्चारण में शत-प्रतिशत अनुरूपता है। ये कथन प्राचीन संस्कृत के लिये सही है, आधुनिक हिंदी के लिये नहीं।

Dil Chahta Hai

13 April, 2010

मेरे पहले लेख की विषयवस्तु थोड़ी गंभीर थी। इस बार पाठकों के विनोद के लिये विषय बॉलीवुड से चुना है। कुछ दिन पहले टीवी पर फ़िल्म “दिल चाहता है” आ रही थी तो मुझे याद आया कि मैंने जब ये फ़िल्म पहली बार सन् २००१ में देखी थी तो मुझे ऐसा लगा था कि इस फ़िल्म के कई संवाद पहले अंग्रेज़ी में सोचे गए हैं और बाद में उनका हिंदी में अनुवाद किया गया है। ऐसे संवाद अंग्रेज़ी से शब्दशः परिवर्तित किये हुए लगते हैं और इस तरह बोलना हिंदी में अस्वाभाविक महसूस होता है, इसलिये ये फ़ौरन ध्यान में आते हैं। इस संभावना की तरफ़ इशारा करते हुए चार उदाहरण पेश हैं।

“मैं सिर्फ़ मज़ाक कर रहा था।”

(आकाश, क्लब में मौजूद लोगों से।)

अंग्रेज़ी के वाक्य “I was just joking” के शब्द “just” का समावेश “सिर्फ़” के रूप में देखें। हिंदी में “मैं तो मज़ाक कर रहा था” या “मैं तो बस मज़ाक कर रहा था” ज़्यादा सहज लगता है।

“अपना चहरा तो देख। चादर की तरह सफ़ेद हो गया है।”

(आकाश सिड से कहता है उसको अचानाक जगा के उसके सदमे पर हँसते हुए।)

अंग्रेज़ी के मुहावरे “white as a sheet” का श्ब्दशः अनुवाद। ज़्यादातर हिंदुस्तानी लोगों के चहरों में इतना मेलनिन तो ज़रूर होता है कि सदमे की वजह से ख़ून के हट जाने पर चहरा ज़्यादा से ज़्यादा पीला पड़ सकता है “चादर की तरह सफ़ेद” नहीं।

“तुम बहुत सारे अगर बोल रहे हो।”

(पूजा सिड से, जब वो झिझकते हुए अपने जज़्बात उसको बताने की कोशिश कर रहा होता है।)

अंग्रेज़ी में “you are saying too many ifs”। हिंदी में इस तरह कहना स्वाभाविक नहीं है। “तुम बहुत अगर-अगर बोल रहे हो” ज़्यादा सहज है।

“Cool! एक और holiday!”

(आकाश अपने पिता से, ऑस्ट्रेलिया जाने को कहे जाने पर)

Holiday का इस अर्थ में इस्तेमाल (छुट्टी पर किसी दर्शनीय जगह मनोविनोद के लिये जाना) संतुक्त राज्य अमरीका में ज़्यादा प्रचलित है, भारतीय शैली की अंग्रेज़ी में नहीं। यहाँ holiday का मतलब सिर्फ़ काम या पढ़ाई से अवकाश माना जाता है।

पहले अंग्रेज़ी में सोचे गए संवादों के नमूनों की बात तो हो गई पर इसका एक अपवाद बताए बिना बात पूरी नहीं होगी। यानी ऐसा एक संवाद जो हिंदी में ही सोचा जा सकता था।

(आकाश सिड से कहता है उसकी नई लगावट का मज़ाक उड़ाते हुए)

“आज पूजा, कल कोई दूजा