Posts Tagged ‘rishi’

Spelling in Hindi

30 April, 2010
ये बात सन् ८४ या ८५ की है जब मैं पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ता था। हिंदी की अध्यापिका एक एक बच्चे को बुला के ब्लैकबोर्ड पर एक एक शब्द लिखवा रही थीं। एक लड़के को “ऋषि” शब्द लिखने को कहा गया और उसने लिखा “रिशी”। मैं “ऋषि” की स्पेलिंग अच्छी तरह से जानता था इसलिये ये देख कर हँस पड़ा कि जो तीन ग़लतियाँ संभव थीं वो तीनों उस लड़के ने कर दी थीं। इन “ग़लतियों” का कारण समझने की कोशिश करते हैं।

१. ऋ पुराने ज़माने में एक शुद्ध स्वर होता था, लेकिन इसका आधुनिक उच्चारण एक व्यंजन+स्वर के जैसा है – दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और गुजरात में रु की तरह और बाक़ी उत्तर भारत में रि की तरह। इसलिये उस लड़के का ऋ को रि में बदल देना स्वाभाविक था।

२. श और ष में फ़र्क़ मात्र सैद्धांतिक है – श का उच्चारण स्थान तालु (palate)  माना जाता है और ष का मूर्धा (alveolar ridge)। आम बोलचाल में दोनों की आवाज़ों में ज़्यादा फ़र्क़ सुनाई नहीं देता। हिंदी में श ष से ज़्यादा प्रचुर है इसलिये उस लड़के ने श का इस्तेमाल किया।

३. हिंदी में कोई शब्द इकारांत हो या ईकारांत, आम बोलचाल में अंत्य इ/ई की अवधि में भेद नहीं किया जाता है।  किसी से आप ऋषि और ख़ुशी शब्द अलग अलग बोलने को कहेंगे तो वो ज़रूर सावधानी से छोटी और बड़ी मात्राओं में अंतर प्रदर्शित करेगा, लेकिन अगर ये किसी वाक्य में सहज रूप से बोले जाएँ तो कोई फ़र्क़ नहीं सुनाई देगा। उदाहरण के लिये ये वाक्य बोलकर देखें – “मेनका को देख कर ऋषि को ख़ुशी हुई”। दोनों स्थितियों में मात्रा प्राय: बड़ी (ई) ही होगी। मेरे उस सहपाठी की वर्तनी भी इसी प्रवृत्ति को दिखलाती है।

जिसने ऋषि शब्द को पहले कभी लिखा हुआ नहीं देखा हो (पाँच-छ: साल के बच्चे से ऐसी उम्मीद करना अनुचित नहीं है) उसके लिये “रिशी” लिखना स्वाभाविक है. उसने अपने स्वर और वर्तनी के ज्ञान का सही इस्तेमाल करते हुए अपनी तरफ़ से ठीक ही लिखा था। कौन कहता है कि हिंदी में लिखित शब्द और मौखिक उच्चारण में शत-प्रतिशत अनुरूपता है। ये कथन प्राचीन संस्कृत के लिये सही है, आधुनिक हिंदी के लिये नहीं।