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Why do you get an extra ‘h’ in the South?

1 November, 2010

The question could also have been asked as “Why do you have a missing ‘h’ outside the South?” Whichever spelling convention you grew up with, chances are it didn’t take you long to understand the cryptic title. If you still haven’t comprehended it, I am referring to त of Indian language words being spelled as ‘th’ in the South and as ‘t’ elsewhere, such as in names like Geetha/Geeta or Ajith/Ajit.

There are four consonants in Indian languages that wouldn’t sound very dissimilar to a native English speaker. These are त, थ, ट and ठ. The two English sounds that come close to this group are ‘t’ as is take and ‘th’ as in think. Let’s call them /t/ and /θ/. There are no exact equivalents between the त-थ-ट-ठ group and the /t/-/θ/ group*. When spelling Indian language words, one of ‘t’ and ‘th’ need to be chosen to represent त, थ, ट and ठ. Which one is chosen for which depends on the native language of the writer and there are certain differences between the languages of the South and those outside the South, which will henceforth be referred to as North for simplicity.

त, थ, ट and ठ can be arranged in a periodic table:

 

Unaspirated (अल्पप्राण) Aspirated (महाप्राण)

Dental (दन्त्य)

Retroflex (मूर्धन्य)

In the Northern languages, both the dental consonants occur with a greater frequency than the retroflex ones, so it becomes more important to distinguish between aspiration and no aspiration, even at the risk of confusing between the places of articulation. In the Southern languages, the unaspirated consonants are more frequent than the aspirated ones. In fact, aspirated consonants occur only in words borrowed from other languages and are often pronounced unaspirated. So it is more important to differentiate between dental and retroflex consonants. In either spelling convention, the differentiation is done using the extra ‘h’. The two spelling conventions come out as:

North

t

th

South

th

t

This is how त gets its different spellings in the North and the South.


* In native English speech, /t/ is alveolar; its place of articulation is somewhere between त and ट. To make matters more confusing, it is aspirated in some contexts such as in the beginning of a word when followed by a vowel (e.g. “toy”). /θ/ is a dental fricative for which too, there’s no exact Indian equivalent. Interestingly, the spelling conventions of the North and the South reveal the difference in its pronunciation. For example, ‘think’ is pronounced as थिंक् in the North and तिंक् in the South.

 

Spelling in Hindi

30 April, 2010
ये बात सन् ८४ या ८५ की है जब मैं पहली या दूसरी कक्षा में पढ़ता था। हिंदी की अध्यापिका एक एक बच्चे को बुला के ब्लैकबोर्ड पर एक एक शब्द लिखवा रही थीं। एक लड़के को “ऋषि” शब्द लिखने को कहा गया और उसने लिखा “रिशी”। मैं “ऋषि” की स्पेलिंग अच्छी तरह से जानता था इसलिये ये देख कर हँस पड़ा कि जो तीन ग़लतियाँ संभव थीं वो तीनों उस लड़के ने कर दी थीं। इन “ग़लतियों” का कारण समझने की कोशिश करते हैं।

१. ऋ पुराने ज़माने में एक शुद्ध स्वर होता था, लेकिन इसका आधुनिक उच्चारण एक व्यंजन+स्वर के जैसा है – दक्षिण भारत, महाराष्ट्र और गुजरात में रु की तरह और बाक़ी उत्तर भारत में रि की तरह। इसलिये उस लड़के का ऋ को रि में बदल देना स्वाभाविक था।

२. श और ष में फ़र्क़ मात्र सैद्धांतिक है – श का उच्चारण स्थान तालु (palate)  माना जाता है और ष का मूर्धा (alveolar ridge)। आम बोलचाल में दोनों की आवाज़ों में ज़्यादा फ़र्क़ सुनाई नहीं देता। हिंदी में श ष से ज़्यादा प्रचुर है इसलिये उस लड़के ने श का इस्तेमाल किया।

३. हिंदी में कोई शब्द इकारांत हो या ईकारांत, आम बोलचाल में अंत्य इ/ई की अवधि में भेद नहीं किया जाता है।  किसी से आप ऋषि और ख़ुशी शब्द अलग अलग बोलने को कहेंगे तो वो ज़रूर सावधानी से छोटी और बड़ी मात्राओं में अंतर प्रदर्शित करेगा, लेकिन अगर ये किसी वाक्य में सहज रूप से बोले जाएँ तो कोई फ़र्क़ नहीं सुनाई देगा। उदाहरण के लिये ये वाक्य बोलकर देखें – “मेनका को देख कर ऋषि को ख़ुशी हुई”। दोनों स्थितियों में मात्रा प्राय: बड़ी (ई) ही होगी। मेरे उस सहपाठी की वर्तनी भी इसी प्रवृत्ति को दिखलाती है।

जिसने ऋषि शब्द को पहले कभी लिखा हुआ नहीं देखा हो (पाँच-छ: साल के बच्चे से ऐसी उम्मीद करना अनुचित नहीं है) उसके लिये “रिशी” लिखना स्वाभाविक है. उसने अपने स्वर और वर्तनी के ज्ञान का सही इस्तेमाल करते हुए अपनी तरफ़ से ठीक ही लिखा था। कौन कहता है कि हिंदी में लिखित शब्द और मौखिक उच्चारण में शत-प्रतिशत अनुरूपता है। ये कथन प्राचीन संस्कृत के लिये सही है, आधुनिक हिंदी के लिये नहीं।